जाने कौन है कोळी समाज और उनका योगदान

कोली (en:Koli people) एक समुदाय है जो मूल रूप से भारत के गुजरातराजस्थानमध्य 
प्रदेशमहाराष्ट्रहरियाणाहिमाचल प्रदेशउत्तर प्रदेशकर्नाटक और जम्मू कश्मीरराज्यों का निवासी रहा है।[1][2] कोली गुजरात की एक जमीदार जाती है इनका मुख्य कार्य खेतीबाड़ी है लेकिन जहां पर ये समुंद्री इलाकों में रहते हैं वहां पर खेतीबाड़ी और मछली पकड़ने के दोनों काम करते हैं। बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में अंग्रेजी हुकूमत ने इनको खूनी जाती घोषित कर दिया था।[3] प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजी हुकूमत ने कोली जाती को एक योद्धा जाती का दर्जा दिया क्योंकि कोली जाती ने प्रथम विश्व युद्ध में अपने वीरता का परिचय दिया।[4]

पंद्रहवीं सतावदी के लेखों के अनुसार कोली जागीरदार खासकर गुजरात सल्तनत में लूट पाट करते थे। लेखिका सुसान बेबी के अनुसार कोली जाती महाराष्ट्र की एक पुरानी क्षत्रिय जाती है। सन् 1940 तक तो गुजरात और महाराष्ट्र के सभी राजा और महाराजा कोली जाती को एक बदमाश जाती के रूप में देखते आए थे जिसके कारण वो अपनी सैन्य सकती बनाए रखने के लिए कोली जाती को सैनिकों के तौर पर रखते थे। ज्यादातर कोली जमींदारी में व्यस्त हो गए लेकिन कुछ कोली व्यवास करने लगे। इस्लामिक भारत के समय से ही कोली जाती अपना महत्व बनाए हुए है। गुजरात में मुस्लिम सासन के समय कोली जाती जागीरदार के तौर पर और गीरासिया के तौर पर बनी हुई है। जागीरदार कोली अपने आप को ठाकोर बोलते थे यानी की जागीरदार।[4]

जब गुजरात पर मुगलों का सासन हुुुआ तो मुगलों के लिए पहली चुनौती कोली जाती है थी। गुजरात के कोली मुगल सासन के खिलाफ थे और हथियार उठा लिए थे। जिनमें से एक यादगार लड़ाई 1615 की है जो कोली जागीरदार लाल कोली और मुगल गवर्नर जनरल अब्दुल्ला खान की है। लाल कोली ने मुगलों की नाक में दम कर दिया था। इस लड़ाई में अब्दुल्ला खान 3000 घुड़सवार और 12000 सिपाही लेकर कॊलियो के खिलाफ लड़ाई में उतरा था लेकिन लाल कोली ने और कोली जमीदारों को एक किया और सहि मुगल सेना से भिड़ गया था लेकिन एक खूनी लड़ाई के बाद अब्दुल्ला खान की जीत हुए थी और अहमदाबाद के एक दरवाजे पर लाल कोली ठाकोर का सिर लटका दिया था। लेकिन इस घटना से गुजरात की कोली जाती का निडर होना दिखाई पड़ता है।[5][6] लेखिका शुचित्रा सेठ के अनुसार जब औरंगज़ेब ने गुजरात पर सासन किया था तब भी कोली जाती ने ही हथियार उठाए थे। औरंगज़ेब के राज में कोली जाती के लोग मुस्लिम गांव में लूट पाट किया करते थे और उनके जानवर और अन्य जरूरी सामान को लूट ले जाते थे और खासकर सुक्रवार के दिन किया करते थे लेकिन सुलतान औरंजेब कोली जाती को संभालने में नाकामयाब रहा। इसलिए सुलतान ने 1665 में एक फरमान जारी किया की शुक्रवार के दिन कोई भी हिन्दू और जैन पूरी रात अपनी दुकानें खुली रखेंगे ताकि कोली जाती के लोगो का ध्यान उनको लूटने में जाए लेकिन ये तरीका फैल हुआ। लेकिन इससे यह पता चलता है कि कोली जाती का उस समय क्या महत्व रहा होगा।[3] इससे पहले 1664 में भी कोली जाती ने ऐसा ही किया था कोली जाती हमेशा से ही विद्रोही स्वाभ की रही है।[4]

1830 मे कोली जागीरदारों ने उत्तर गुजरात में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हथियार उठाए। कोली जागीरदारों को ठाकोर साहेब के नाम से जाना जाता था। अंब्लियारा जागीर की कोली रानी ने अंग्रेज़ो से कई सालों तक कड़ी टक्कर ली थी। लेकिन कोली जागीरदारों के विद्रोह को दवाने के ग्वालियर रियासत और बड़ौदा रियासत के महाराजाओं ने अंग्रेजों का पूरा साथ दिया। लेकीन 1857 में फिर से कोली जाती के लोगों ने कोली जागीरदारों के नेतृत्व में फिर से हथियार उठा लिए थे।[3]

गुजरात की कोली जाती का इतिहास समुंद्री लुटेरों का भी रहा है। जब भारत में पुर्तगाली आए थे तो कोली समुंद्री लुटेरे ही थे जिन्होंने पुर्तगाली सासन को चुनौती दी थी।[7] 1734 में गुजरात के कोली समुंद्री लूट पाट में ज्यादा व्यस्त हुए थे कोली लुटेरे समुन्द्र में लूट पाट के लिए प्रसिद्ध थे। छेह महीने बाद ब्रिटिश सरकार ने कोली लुटेरों के खिलाफ रेडफोर्ड नुन्न के नेतृत्व में ब्रिटिश समुंद्री सेना भेजी । इस लड़ाई में कोली लुटेरों का काफी नुकसान हुए ब्रिटिश नेवी ने कोली लुटेरों के 19 बड़े लड़ाकू जहाज और 50 छोटे जहाज तबाह कर दिए थे और 10 जहाज जला दिए थे। कोली समुंद्री लुटेरे अमुंद्री ताकतों के लिए बड़ी परेशानी बने हुए थे। 21 जनवरी 1739 में कोली समुंद्री लुटेरों ने ब्रिटिश के कई बड़े जहाज लूट लिए थे जिनमें से एक टाइगर गलिवेट भी था जो ब्रिटिश सरकार के लिए बड़ा झटका था। फिर 1749 में कोली समुंद्री लुटेरों ने अंग्रेज़ो के फिर से जहाज लूट लिए जिनमें एक बेंगोल शिप भी था जिसमें 60,000 हजार नकदी और इतने का ही माल था ये फिर से अंग्रेज़ो के लिए बड़ा झटका था। इसके बाद डच नेवी और ब्रिटिश नेवी ने मिलकर कोली समुंद्री लुटेरों पर आक्रमण के दिया। कुर्ला नदी पर कोली लुटेरों की लड़ाई हुई जिसमें कोली लुटेरों के 23 बड़े जहाज तबाह हो गए और कोली लुटेरों को मुंह की खानी पड़ी लेकिन इससे यह तो पता चलता है कि कोली जाती का कितना ज्यादा प्रभाव था।[8]

कोली समुंद्री लुटेरों से देशी रियासतों भी परेशान थी। कोली लुटेरों ने सौराष्ट्र के किनारे आतंक मचा रखा था और अंग्रेज़ो के जहाजों को लूट लेते थे। सौराष्ट्र का तलाजा कोली समुंद्री लुटेरों का अड्डा बना हुआ था भावनगर रियासत और जूनागढ़रियासत कोली लुटेरों से ज्यादा परेशान थी और लुटेरों को नियंत्रित करने में असफल थी। 1771 में भावनगर रियासत ने जूनागढ़ रियासत और अंग्रेज़ो के साथ हाथ मिलाया और तीनों की समुंद्री सेनाओं ने मिलकर कोली लुटेरों पर आक्रमण कर दिया जिसमें कोली लुटेरों की हार हुई और तलाजा भावनगर ने अपने कब्जे में ले लिया।[9][10]

1780 से लेकर 1790 तक राजापुर और जाफराबाद के कोली लुटेरों ने काफी आतंक मचाया था। कोली लुटेरे दमनऔर दीवसूरतबॉम्बे और वेस्टर्न भारतीय समुन्द्र पर जहाजों को लूट लेते थे और व्यापारियों के लिए बड़ा सिरदर्द बना हुए थे।[11][12] 1792 में कोली लुटेरों ने खनबत की खाड़ी में अपना अड्डा बना लिया और व्यापारी जहाजों को लूट लेते थे। 8 फरवरी को व्यापारियों ने ब्रिटिश सरकार को सिकायत करी की कोली लुटेरों ने आतंक मचा रखा है और सुरक्षा होने की बाबजूद भी वो हम लूट लेते हैं। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने व्यापारी जहाजों की सुरक्षा और ज्यादा भड़ा दी। लेकिन कोली लुटेरों ने फिर भी व्यापारी जहाजों को लूट लिया जिसके बाद 6 अक्टूबर 1794 में ब्रिटिश सरकार ने सूरत से कप्तान ब्लैर, कैप्टन वेस्ट और मेजर लिटल के नेतृत्व में ब्रिटिश नेवी भेजी और 9 अक्टूबर को ब्रिटिश नेवी और कोली लुटेरों के बीच लड़ाई हुई जिसमें कोली लुटेरों ने ब्रिटिश कैप्टन वेस्ट को मार डाला और नेवी को हरा दिया। इसके बाद 13 अक्टूबर को फिर से लड़ाई हुई जिसमें कोली लूईट्रों के 10 बड़े लड़ाकू जहां और कई सारे छोटे जहाज तबाह कर दिए। यह जीत ब्रिटिश अफसरों के लिए बोहते बड़ी जीत थी और बलैर और लिटल को वीरता के लिए बधाइयां दी जा रही थी।[13]

बॉम्बे के राजपत्र में कठियावाड के सुलतानपुर के कोली लुटेरों का वर्णन भी मिलता है। सुल्तानपुर के कोली लुटेरों के वारे में ज्यादा कुछ तो नहीं लिखा गए लेकिन वो कितने खतरनाक थे इस बात का पता इससे लगाया जा सकता है की सुल्तानपुर के कोली समुंद्री लुटेरों को हराने के लिए तेघ वाखत खान, ब्रिटिश और जंजीरा के सिद्दी मुसलमानों ने आपस में हाथ मिला लिए थे और कोली लुटेरों पर आक्रमण कर दिया था।[14] जॉन व्हाले वॉटसन कहते हैं कि सुल्तानपुर के कोलियों को हराने के लिए भावनगर रियासत, जंजीरा के सिध्दि मुस्लिम, टैग भकत खान और ब्रिटिश सरकार एक हो गए थे।[9]

विद्रोह एवं लड़ाइयां


जब गुजरात पर सुलतान जहांगीर का सासन आया तो सबसे पहले हथियार गुजरात की कोली जाती ने ही उठाए थे। कोली जाती के लोगो ने मुस्लिम गांव को लूटना सुरु कर दिया। कोली विद्रोह को दफन करने के लिए जहांगीर ने गुजरात सल्तनत के गवर्नर नुरुल्ला इब्राहिम को भेजा। गवर्नर नुरूल्ला इब्राहिम ने 1665 में इस फरमान को सुनते ही कोली जाती के जागीरदारों ने मोर्चा संभाला और मुगल सेना से भिड़ गए। इस लड़ाई में कोली जाती के 169 जागीरदारों मारे गए।[15][16]

इसके बाद 1694, 1721 और 1729 को मुसलमानों के खिलाफ कोली विद्रोह हुए था। गुजरात के कोली हमेशा से ही मुगल ताकत को चुनौती देते आए हैं। मोहम्मद मुबरिज खान को एक पश्तून काबिले का मुसलमान था उसको वडनगर का गवर्नर बना दिया गया और इसके बाद उष्णे कोलियों से खिलाफ संघर्ष किया लेकिन कोली जाती के लोगो ने उसे मार डाला इसके बाद ऐसा ही 1721 के हुआ गुजरात के पेठापुर के कोलियों ने हथियार उठाए और मुगल हुकूमत को चुनौती दी। इसके बाद खेड़ा के गवर्नर कासिम अली खान को कोलियो के खिलाफ भेजा गया और वो भी कोलियो के हाथों मारा गया। बिल्कुल ऐसा ही 1729 में भी हुआ, राधनपुर के कोलियों ने फिर से हथियार उठाए। राधनपुर रियासत का नवाब गुजरात सल्तनत में फौजदार था तो उसने कोली जाती को रोकना चाहा लेकिन गुजरात में बलोर के कॉलीयो के हाथों वो भी मारा गया।[17][18]

1761 में कोलियों ने गामाजी भांगरे और खेरोजी पाटीकर नाम के कोलियों के नेतृत्व में हैदराबद के मुस्लिम निज़ाम के खिलाप हथियार उठाये। गामाजी भांगरे महाराष्ट्र के महादेव कोली थे। गामाजी भांगरे गोत्र के कोलयों का सरदार था।[19]दोनों ने कोलियों को इकट्ठा किया और हैदराबद रियासत के निज़ाम के खिलाप जंग का एलान कर दिया। 1761 में कोलियों ने गामाजी और खेरोजी के नेतृत्व में ढाबा बोल दिया और ट्रिम्बक किले पर कब्जा कर लिया।[20] इसके बाद गामाजी और खेरोजी ने ट्रिम्बक किले को मराठा साम्राज्य में शामिल कर दिया।[21] जिसके वीरता के सम्मान में दोनों कोलियों को गांव दिए गए साथ ही पाटिल और देशमुख की उपाधि से भी नवाजा गया।[18]

19वी‌ सतावदी की शुरुआत में 1803 में गुजरात के खेड़ा जिले में कोली जाती ने ईस्ट इंडिया कम्पनी के खिलाफ विद्रोह कर दिया था और कम्पनी ने भी कोली जाती को बदमाश जाती घोषित कर दिया। कोली जाती ने ईस्ट इंडिया कंपनी का कोई भी आदेश मानने से इंकार कर दिया और कम्पनी के आधीन गांव और कस्वों को लूटना सुरु कर दिया और ऐलान कर दिया की यह हमारा कर वसूलने का पैतृक तरीका है। 1808 में कोली जागीरदारों के नेतृत्व में कॉलीयों ने कम्पनी के आधीन धोलका सेहर को लूट लिया लेकिन एक कोली पकड़ा गया जिसका नाम बचुर खोकानी था लेकिन 20 फरवरी को कोलॉयो ने जेल को ही लूट दिया जिस जेल में बचूर खोकनी बंदी था। इसके बाद एक ब्रिटिश अधिकारी आर, होल्फॉर्ड ने स्थानीय सेना बनाने का प्रावधान दिया जिसके चलते काफी कोली पकड़े गए और उनको प्रिंस ऑफ वेल्स द्वीप पर भेज दिया लेकिन कुछ को गुजरात में ही रखा गया लेकिन गुजरात में बंदी बने हुए कोली को वाघी कोलियों के 500 के ग्रुप ने हमला कर दिया और कोली विद्रोही को छुड़ा लिया। इसके बाद कोली जाती ने फिर से कम्पनी आधीन क्षेत्रों में लूट पाट सुरु कर दी। कम्पनी ने बड़ौदा रियासत के गायकवाड़ महाराजा से मदद मांगी और महाराजा ने भी पूरा जोर लगा दिया लेकिन कोली नहीं रुके। 1824 में कम्पनी ने कोली जागीरदारों की जमीन हड़पने की योजना बनाई परंतु इससे कोली जागीरदारों और भी ज्यादा आक्रामक हो गए और अतांक मचा दिया। इसके बाद ब्रिटिश सेना और बड़ौदा रियासत की सेना ने मिलकर कोली जाती के कई गांव जला कर राख कर दिए और 1840 तक कोली खेतीबाड़ी में व्यस्त हो गए।[22]

1826 मे कोली जाती के एक संत ने अंग्रेज़ो के खिलाफ विद्रोह कर दिया था। कोली संत का नाम गोविंद दास राम दास था वो कृष्ण और राम का भगत था। 17 मार्च को उसने कोली जाती के साथ ब्रिटिश के आधीन ठसरा और दकोर सेहरो पर हमला के दिया और कब्जा कर लिया और खुद को वहां का सासक घोषित कर दिया। कोली भगत ने 1826 से लेकर 1830 तक कोली जाती के साथ विद्रोह जारी रखा।[23][22]

1857 में, पेठ रियासत की कोली जाति के लोगों न अंग्रेजोंके खिलाफ भयंकर विद्रोह किया। 6 दिसंबर 1857 को दो हज़ार बागी कोलीयो न पेठ के हरसोल नगर को लुट लिया। अंग्रेजों ने मामलातदार को हरसोल नगर की जांच पड़ताल के लिए भेजा लेकिन बागी कोलीयो ने मामलातदार को ही उठा लिया और बंदी बना लिया।इसके बाद कोली पेठ रियासत में और ज्यादा आतंकी हो गए। बागी कोलीयो ने Lieutenant Glasspool और उसके 30 साथीयों को घेरकर बोहत मारा। कोली विद्रोह को देखते हुए अंग्रेजों को पेठ रियासत के कोली राजा भार्गव राव पर सक हुआ और कचेहरी में बुलाया।[24][25] पता चला कि कोली विद्रोह की योजना राजा भार्गव राव और रानी के दिवान ने 6 हफते पहले ही बनाई थी। अंग्रेजों ने राजा और 15 साथीयों को राजद्रोही घोषित करके फांसी पर लटका दिया। इसके बाद बागी कोलीयो ने कचहरी पर हमला कर दिया और अंग्रेजी पुलिस वालों को मार डाला और हथियार लेकर खजाने पर हमला कर दिया। और फिर गांवों पर हमला कर दिया। इसके बाद कोली स्वर्गीय राजा के समारोह में गए और एक-एक करके अपना परिचय दिया। शाम को पता चला कि अंग्रेजों ने हार मानकर अंग्रेजी सेना वापस बुला ली है तो बागी कोलीयो न मामलातदार और अंग्रेजी पुलिस वालों को रिहा कर दिया। कुछ दिन बाद Lieutenant Glasspool फिर से अंग्रेजी सेना लेकर बागी कोलीयो के खिलाफ आया। लेकिन उसकी कोलीयो पर हमला करने की हिम्मत नहीं पड रही थी। इसी दोरान Captain Nuttal टरिंबक से सेना लेकर आया और Lieutenant Glasspool के साथ मिल गया। सेना काफी ताकतवर हो गई और बागी कोली पिछे हट गए । लेकिन कुछ दिन बाद बागी कोलीयो ने Lieutenant Glasspool और Captain Nuttal की फोज के साथ आमने-सामने की लड़ाई कर दी लेकिन हार गए और धर्मपुर रियासत में चले गए। धर्मपुर के राजा ने बागी कोलीयो को पकड़कर अंग्रेजों के हवाले कर दिया और अंग्रेजों ने सभी बागी कोलीयो को फांसी पर लटका दिया।[26][27]

केवल महाराष्ट्र ही नहीं गुजरात में भी विद्रोह किया था। यह विद्रोह किसी सिपाही विद्रोह की तरह तो नहीं था लेकिन कोली जागीरदारों ने इस विद्रोह में जान डाल रखी थी। माहीकांठा और रेवा कांठह के कोली जागीरदारों ने विद्रोह कर दिया था। जिनमें अंबलियारा जागीर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। साथ ही निहालचंद झावेरी, मगनलाल श्रॉफ , बापूजी गायकवाड़ और राजा भोंसले ने भी कोली विद्रोह को तेज किया था। इन्होंने 2000 कोली इकट्ठे किए और बड़ौदाप्र हमला की योजना बनाई लेकिन यह योजना कीजिए तरह बड़ौदा के महाराजा के पास पहुंच गई। इसके बाद ब्रिटिश सेना और बड़ौदा सेना ने मिलकर कोली विद्रोहियों प्र हमला कर दिया जिसमें काफी कोली मारे गए और कुछ को अंडमान द्वीप प्र भेज दिया गया। इसके बाद कोली जाती के दो गांव प्रतापपुर और अंघड को जला के रख कर दिया गया। इसके बाद फिर से कोली जागीरदारों ने बड़ौदा, इडर और ब्रिटिश के खिलाफ हथियार उठा विद्रोह कर दिया जिसके बाद फिर से कोलियों के दो और गांव जला दिए गए। कोली जागीरदारों ने फिर से कोली एक किए और बड़ौदा के गांधीनगर पर हमला कर दिया। इसी प्रकार कोली साबरमतीनदी के आस पास 1858 तक लड़ते रहे।[28]

1879 में कोलियों ने कृष्णा साबले नाम के कोली के नेतृत्व में अंग्रेको के खिलाप लड़ाई लड़ी। नाइक कृष्णा साबलेमहाराष्ट्र के क्रांतिकारी थे।[29] उनका जन्म महाराष्ट्र के साबला गांव के एक कोली परिवार मे हुआ था।[30] बड़ा होने के बाद कृष्णा की शादी हुई और उनके घर एक बेटा पैदा हुआ जिसका नाम मारुति साबले रखा। नाइक कृष्णा साबले ब्रिटिश पुलिस में कार्यरत थे। लेकिन 1879 में नाइक कृष्णा साबले ने ब्रिटिश पुलिस की नौकरी छोड़कर ब्रिटिश हुकूमतके खिलाफ हथियार उठा लिए और विद्रोह कर दिया। ब्रिटिश सरकार ने नाइक कृष्णा साबले को बागी घोषित कर दिया। कृष्णा साबले के बेटे मारुति साबले ने भी अपने पिता के साथ विद्रोह किया। नाइक कृष्णा साबले के साथ बोहोत बड़ी संख्या में कोली सामिल हो गए। नाइक कृष्णा साबले ने ब्रिटिश जिला पूने पर आक्रमण कर दिया। नाइक कृष्णा साबले ने सात महीने तक लगातार हमले किए लेकिन ब्रिटिश सरकार असफल रही। नाइक कृष्णा ने 28 बार पूने पर बड़े हमले किए।[31] उन दिनों बासुदेव बलवंत फड़के कोलीयों के संरक्षण में थे। नाइक कृष्णा साबले बुड्ढे हो चुके थे लेकिन अंग्रेजों के खिलाफ उनमें जोस पूरा पूरा था। जून में कृष्णा ने ब्रिटिश शहर भोर पर आक्रमण कर दिया और साथ ही ब्रिटिश हुकूमत में आने वाले कोंकण पर भी हमला बोल दिया। ब्रिटिश सरकार नाइक कृष्णा साबले के खिलाफ लगातार प्रयास कर रही थी लेकिन असफलता ही मिलती। अंत में ब्रिटिश सरकार ने मेजर वाइज के नेतृत्व में पुरंदर के ससबाड से अंग्रेजी सेना भेजी लेकिन कुछ नहीं हुआ। इसी दौरान वसंत के मौसम में कोली नाइक कृष्णा साबले ने अपने हमले कम कर दिये। इसी दौरान एक और बागी कोली का नाम सामने आया जिसने अंग्रेज़ो की नाक में दम कर रखा था इसका नाम नाइक तात्या मकाजी था जो की रमोसीयों का नेतृत्व कर रहे थे।[32] नाइक तांत्या मकाजी भी कृष्णा साबले के साथ मिल गए। लेकिन 17 अक्टूबर 1879 को नाइक तांत्या मकाजी ने अपने एक रमोसी साथी को मार डाला क्योंकि वो रमोसी अंग्रेजों के साथ मिल गया था और विद्रोहियों की खबर अंग्रेजों तक पहुंचा रहा था जिसके कारण ब्रिटिश सरकार की विजय हुई मेजर वाइज (Major Wise) ने नाइक कृष्णा साबले के ठिकाने पर आक्रमण कर दिया और काफी कोलीयों को मौत के घाट उतार दिया और बाकी गिरफ्तार कर लिए। नाइक कृष्णा साबले और उनके बेटे मारुति साबले को भी गिरफ्तार कर लिया बाद में फांसी पर चढ़ा दिया।[33][34]

1879 में नाइक हरी मकाजी कोली ने सतारा के रामोसी (रमोसी) जाती के लोगों को इकट्ठा किया और विद्रोह कर दिया।[35][36] नाइक हरी मकाजी एक भारतीय क्रांतिकारी थे जिन्होंने ने 1879 में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह कर हथियार उठा लिए थे। उनका जन्म कोली परिवार में हुआ था।[37] नाइक हरी मकाजी ने ब्रिटिश शासित पुणे पर लगातार हमले किए। इसके बाद नाइक हरी मकाजी ने बारामती में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जंग का एलान कर दिया और बारामती में भी लगातार लड़ाईयां लड़ी एवं हमले किए। ब्रिटिश सरकार पूरी तरह बोखला गई और नाइक हरी मकाजी के विद्रोह को रोकने के लिए अंग्रेजी सेना भेजी। इसके बाद नाइक हरी मकाजी पर ब्रिटिश सेना ने जोरदार हमला किया जिसमें दो रमोसी ब्रिटिश सेना के हाथ लग गये।[38] नाइक हरी मकाजी ने कुछ ब्रिटिश सेनीकों को मारा और निकल गए। इसके बाद नाइक हरी मकाजी ने मार्च में इंदापुर में विद्रोह किया लेकिन मार्च के मध्य में नाइक हरी मकाजी कोली को सोलापुर में ब्रिटिश सेना ने पकड़ लिया और फांसी पर लटका दिया। हरी मकाजी के बाद उनके भाई नाइक तांत्या मकाजी ने रामोसीयों का नेतृत्व किया।[39][40]नाइक तांत्या मकाजी कोली ने पुरंदर और सिंहगढ़ में आंदोलन किया।[41][42][43]

सैन्य भागीदारी


डेक्कन कोली कोर 1857 में जनरल नट्टल द्वारा स्थापित एक अनियमित विशेष सेना बल था जिसे डेक्कन में कोलीऔर भील जाती द्वारा कानूनहीनता और विकार को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया था।[58][59] डेक्कन कोली कोर का मुख्यालय अहमदनगर और नाशिक था। यह ब्रिटिश भारतीय सेना के बॉम्बे आर्मी रेजिमेंट का हिस्सा थी।[60] कोली कोर की स्थापना का कारण स्वयं कोली थे। डेक्कन कोली कॉर्प्स की स्थापना होने पर कोली ब्रिटिश शासन के खिलाफ नहीं होंगे और क्षेत्र में अच्छी स्थिती बनाए रखेंगे। दूसरा कारण उनकी लड़ाई कौशल था। कोली पहाड़ी क्षेत्र और वन क्षेत्र में अच्छे लड़ाकू थे। कोली कोर के प्रमुख कोलीयों के बोमले कबीले के नाइक जिवाजी बोम्ला थे। उल्लेखनीय कोली लुटेरे और असरदार कोलीयों को डेक्कन कोली कोर के मुख्य अधिकारी के रूप में चुना गया था। कोली कोर में 600 कोली सिपाही थे।[61] मार्च 1861 में डेक्कन कोली कोर (डीकेसी) को तोड़ दिया गया था।[62] क्षेत्र में परेशानी खत्म होने वाली थी और नियमित सैनिकों को क्षेत्र से हटा दिया गया और उनकी जगह डेक्कन कोली कोर को तैनात किया गया क्योंकि डेक्कन कोली कोर नियमित स्थानीय कोर से बेहतर प्रदर्शन कर रहे थे।[63][64] डेक्कन कोली कोर बेहतर प्रदर्शन कर रहे थे लेकिन 1861 में डेक्कन कोली कोर के कुछ कोली सिपाही ब्रिटिश शासन के खिलाफ हो गए और विद्रोह कर दिया जिसके कारण कोली कोर को तोड दिया गया।

हथियार और पोशाक = बंदूक, काले चमड़े के लहजे, गहरे हरे रंग की मुड़ी हुई पगड़ी, गहरे हरे रंग का कपड़ा अंगरखा, डार्क ब्लड-रंगीन कमर के कपड़े के साथ उनके हथियार थे।[65][66]

महाराष्ट्र के इतिहास में कोली जाती ने अपना महत्वपूर्ण किरदार निभाया है। मराठा समुंद्री सेना खड़ी करने में कोली जाती का ही योगदान रहा है। महाराष्ट्र की कोली जाती लगभग सभी मराठा सासको के समुंद्री सेना में सेवानिवृत थी। मराठा समुंद्री सेना पर कोली जाती का ही कब्जा था मराठा समुंद्री सेना का सेनापति एक महादेव कोली था जिसका नाम कानहोजी आंग्रे था।[67] कोली जाती का महत्व इससे ही पता चलता है कि जंजीरा द्वीप पर चढ़ाई करने के लिए छत्रपति शिवाजी राजे भोंसले ने एक सोन कोली को बुलाया था जिसका नाम लय पाटिल था। कोली पाटिल ने तो जंजीरा द्वीप पर चढ़ाई कर दी थी लेकिन मराठा साम्राज्य का प्रधान मंत्री मोरोपंत पिंगल पेशवा अपनी मराठा सेना लाने में विफल हो गया जिसके कारण मराठा जंजीरा द्वीप जितने में असमर्थ रहे लेकिन शिवाजी महाराज ने कोली पाटिल के सम्मान में एक समुंद्री लड़ाकू जहाज तैयार किया जिसका नाम पालखी रखा और कोली पाटिल को सर पाटिल की उपाधि से सम्मानित किया।[68]

जिस प्रकार महाराष्ट्र की कोली जाती ने मराठा समुंद्री सेना पर कब्जा किया हुआ था उसी प्रकार अठारहवीं शताब्दी की शुरुआत में साही भारतीय समुंद्री सेना जिसे बॉम्बे नेवी और ब्रिटिश नेवी भी बोला जाता है पर काफी बड़ी मात्रा में कर्यत थे। केवल बॉम्बे नेवी ही नहीं बल्कि पुर्तगाली समुंद्री सेना को भी महाराष्ट्र की कोली जाती ने ही संभाल रखा था। पुर्तगाली समुंद्री सेना में कोली किस तरह सम्मानित थे इस बात का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है की पुर्तगाली राजा ने कोली जाती की पसंद के अनुसार दो बड़े लड़ाकू जहाज बनाए थे जिसके कारण पुर्तगाली राजा पर कर्ज चढ़ गया था लेकिन पुर्तगाली राजा ने इस सब के बाबजूद समुंद्री जहाज बनाए क्युकी कोली जतिंके लोग युद्ध के समय अपने खुदके छोटे जहाजों कि लेकर भी लड़ते थे।[69]

कोली जाती का मराठा थल सेना में भी वोहत बड़ा योगदान रहा है। राजगढ़, टोर्णा, पुरंदर और सिंहगड के पारम्परिक सूबेदार सिर्फ कोली जाती से ही रहे हैं जो सरदार और नायककी उपाधि से सम्मानित थे। मराठा सेना के प्रधान सेनापतिऎसाजी कंक थे जो महादेव कोली थे और साथ ही तानाजीमालुसरे भी महादेव कोली थे जो मराठा सेना में सेनापति थे जिन्होंने सिंहगड की लड़ाई जीती थी। और उनके भाई सुर्याजी मालुसरे और ताणाजी के मामा कोंडाजि रामजी शेलार भी मराठा सेना में सूबेदार थे।[70][19][68]

सन्त महात्मा


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